सफर खजुराहों का....🚆
प्रणाम मित्रों...🙏
एक लंबे अरसे के बाद आपसे मुखातिब होने का अवसर मिल रहा है। असल में ज़िंदगी उलझी पड़ी थी कि कोई ढंग का मुकाम मिले, जिससे रोज़ी-रोटी का जुगाड़ हो सके। अब कही जाके वरिष्ठ अध्यापक का दर्जा हासिल हो सका। आज के समय में बेरोजगारों की भीड़ से अलग निकलना काफी मशक्कत भरा काम है। असम्भव नहीं है, पर सम्भव कोई कोई ही कर पाता है।
खैर तो जैसा कि शीर्षक से आपकों लग रहा होगा कि खजुराहो, जो कि एक बहुत ही इतिहास प्रसिद्ध स्थल है, मैं आपको वहाँ का यात्रा-वृत्तांत सुनाने वाला हुँ, तो जनाब आप बिल्कुल गलत अनुमान लगा रहे हैं। असल मे मैं आपको सुना रहा हूँ दास्ता उस सफर की जो हमने खजुराहों जो कि एक लोहपदगामिनी का नाम है जो उदयपुर से खजुराहों के बीच चलती है, से तय किया । वैसे मैने इसमें कई बार सफर किया लेकिन खजुराहों जाने के लिए नहीं बल्कि जयपुर की यात्रा करने के लिए। हाँ तो जैसा कि मैने कहा कि ये कोई पहली बार नहीं था, पर ये सफ़र यादगार है इसलिए आपके बीच प्रस्तुत कर रहा हूँ। वो भी इसलिए क्योंकि समय की मांग है।
बात 2018 की है। राजस्थान पुलिस विभाग द्वारा कानिस्टेबल की भर्ती प्रक्रिया जारी थी। लिखित परीक्षा हो चुकी थी और अब बारी थी शारिरिक दक्षता परीक्षा की। आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि उदयपुर संभाग में होने वाली कानिस्टेबल भर्ती की शारिरिक दक्षता परीक्षा का ठेका मेरे पास ही है। असल मे जो कंपनी (timing technology) यह कार्य करवाती है उसके लिए में संभाग स्तर पर कम्प्यूटर ऑपरेटर का जुगाड़ करता हूँ। तो इस भर्ती के सिलसिले में तकरीबन रात 9:30 बजे कंपनी के एक कर्मचारी का कॉल आया और कहा कि आपको एक दिन की ट्रेनिंग के लिए जयपुर आना पड़ेगा। और हो सके तो अभी निकलिए। मैने कहा कि हद है यार आग लगी पड़ी है और आप कह रहे कि कुआँ खोद लीजिये। अब मरता क्या न करता जाना तो था ही। मेरा एक मित्र नरेंद्र जो कि उस सफर में मेरा बराबर का भागीदार था, दोनों ने सलाह मशविरा की और निकल पड़े जयपुर के लिए।
अब जैसा कि मैने आपको खजुराहो का थोड़ा परिचय पहले दे दिया था। यह रेलगाड़ी रात तकरीबन 10:30 बजे उदयपुर रेलवे स्टेशन से खजुराहों के लिए निकलती है और 6:00 बजे के लगभग जयपुर पहुँचती है। अगर आपको इस रेलगाड़ी के सामान्य डिब्बे में सफर करना है तो यह जरूरी है कि आप 9:00 बजे के लगभग स्टेशन पहुँच जाए ताकि अपने लिए सीट आरक्षित कर सकें।हम जब स्टेशन पहुँचे तो 10:15 हो चुके थे।तो अब सीट मिलना तो असम्भव हो गया था। और समय इतना हो चुका था कि गाड़ी में खड़े होने तक कि जगह नहीं थी। गाड़ी खचाखच भरी थी। यही विशेषता है इस गाड़ी की। लंबी दूरी तय करने के कारण , तीन राज्यों में गमन के कारण, कई प्रवासी मजदूरों का जीविका के लिए उदयपुर जैसे शहरों में रहने के कारण, रात्रि गाड़ी के कारण, और उस समय शायद राखी का त्योहार भी नजदीक था, उसके भी कारण, और सबसे अंतिम कारण कुछ देशभक्त मुसाफिरों को बिना टिकट यात्रा करने की भी सहूलियत रहती है इस कारण भी उस दिन की भीड़ को हम मुम्बई लोकल का दर्जा दे सकते है।
अब हम दोनों मित्र भी जैसे तेसे करके, भीड़ को चीरते हुए गाड़ी के अंदर घुसे। बड़ी कठिनाई और जद्दोजहद के बाद खड़े रहने की जगह बना पाए। गाड़ी नियत समय पर एक लम्बे शायरन के साथ स्टेशन छोड़ने लगी। उसी के साथ मस्तिष्क में विचारों का प्रवाह भी तेज हो गया कि कैसे कटेगी ये रात। ऐसा नहीं है कि रात भर जागने के आदी नहीं है। पर शर्त यह है कि रात भर जागना है खड़े रहकर, वो भी एक ही मुद्रा में। इसलिए थोड़ा कठिन जान पड़ रहा था और ऊपर से ये शौचालय की बदबू, मत पूछिए जनाब। बात सिर्फ इतनी सी नहीं थी अभी तो गाड़ी की शुरुआत थी। अभी तो रास्ते मे कई स्टेशन बाकी थे जहां मुसाफिर इंतज़ार कर रहे थे गाड़ी का भी और हमारी वाट लगाने का भी।
यकीन मानिए मित्रों उस रात पूरी रात खड़े रहे वो भी एक ही मुद्रा में। आगे कहीं चलकर दो मित्र और ऐसे चढ़े जिन्होंने शौचालय को हीअपनी गिरफ्त में ले लिया और अदंर से कुंडी बन्द कर दी। जगह की कमी के खलते उन्हें ये कदम उठाना पड़ा। एक महाशय जो हमसे पहले ही उदयपुर स्टेशन से बैठे थे वो तो रात भर शौचालय के बाहर लगे बेसिन में बैठे रहें।जब उनसे पूछा कि चचा कहाँ जाओगे तो उन्होंने अपना ठिकाना आगरा बताया। क्योकि जब हमने जयपुर में ट्रेन छोड़ी थी तब भी भीड़ उतनी ही बरकरार थी तो मुझे नहीं लगता कि उन्होंने आगरा तक उस बेसिन का त्याग किया होगा। और हां एक बात तो बताना ही भूल गया कि डिब्बे के शौचालय को हमने यानी लगभग 25 मुसाफिरों ने गेर रखा था। यानी कि डिब्बे के किसी पैसेंजर को यदि लघुशंका लगती जो कि लगी ही क्योंकि रात भर का सफर है, तो ये लाज़िमी है, पर उस शख्स को हमने शौचालय तक पहुँचने नहीं दिया। जहां पेर धरने की जगह नहीं वहाँ किसी व्यक्ति को जाने का रास्ता कैसे दिया जा सकता है आप ही सोचिये। जब कोई भूले भटके उस तरफ आता तो शोर होने लगता...रुक नहीं सकते जनाब....देख नहीं रहे कितनी भीड़ है....यहाँ खड़े रहने की जगह नहीं है और इनको मूतने की पड़ी है....थोड़ा कन्ट्रोल करो.....।
इस तरह जैसे तैसे जयपुर पहुँचे और चेन की सांस ली। वहाँ पहुँचकर मेरे एक मित्र के कमरे पर पहुँचकर, नहाधोकर जिस काम के लिए आये वो निपटकर, खाना खाकर तकरीबन रात 10 बजे फिर से निकलने के लिए बस में सवार हुए और बस में ऐसी आंख लगी कि उदयपुर आके ही खुली.....
वर्तमान में जब सारा विश्व कोरोना जैसी महामारी से लड़ रहा है। सोशियल डिस्टेसिंग जैसे शब्द सामने आए तो क्या आपको लगता है कि भारत जैसे देश जहां हजारों-लाखों की संख्या में प्रवासी मजदूर अपने आशियाने से इधर-उधर बिखरे पड़े है वहाँ ऐसे शब्द कारगर सिद्ध होंगे। खजुराहों कोई पहली गाड़ी नहीं है, ऐसी गई गाड़िया और बसे है जो रोजाना खचाखच भरी हुई जाती है उन पर रोक लग सकेगी। गरीब व्यक्ति के पास इतना पैसा नहीं कि वो शयनयान का टिकट ले कर यात्रा करें। वो मजबूर है ऐसी भीड़ भरी यात्रा करने को, क्योंकि उस दिन हम भी मजबूर थे।
क्रमबद्धता के साथ सुंदर प्रस्तुति..औऱ अंत मे ज्यो तात्कालिक विषय है उसकी भारत के संदर्भ में हकीकत बया करना वो भी कम शब्दों में....वा क्या बात है 👌👌👍
ReplyDeleteबहुत शुक्रिया जनाब.....🙏
DeleteHeart Touching message ....panna Lal
ReplyDeleteबहुत धन्यवाद सर....☺️☺️
DeleteWah pawan bhai wah
ReplyDeleteशुक्रिया.
Delete😉😉😉
बहुत खूब जनाब ।
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