संघर्ष
कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता.... आदरणीय गोपालदास नीरज ने जब ये पंक्तियाँ लिखी होगी तो न जाना उनके जहन में क्या रहा होगा. लेकिन आज की युवा पीढ़ी जिसके जहन में निराशा घर कर गई है, उसके लिए ये कविता आशा का नया संचार करती है और जीवन में निरंतर प्रयासरत रहने की शिक्षा देती है. वर्तमान समय में हर नोजवान का सपना रहता है कि वह कोई न कोई सरकारी नोकरी प्राप्त कर ले जिससे उसके जीवन में दाल-रोटी का जुगाड़ हों सकें.(दाल-रोटी इसलिए लिख रहा हूँ क्योंकि सरकारी नोकरी से टाटा, अम्बानी या बिडला बनने से तो रहे) इसी लक्ष्य के साथ वह संघर्ष करता है और लाखों बेरोजगारों की भीड़ में शामिल होता है. सतत एवं निरंतर प्रयास के बलबूते वह अपने लक्ष्य को पाने में सफल होता हैं. लेकिन जो प्रतियोगी असफल हों गये उनका क्या ? उन्ही को जहन में रखते हुए अपने विचार साझा कर रहा हूँ. जब प्रतियोगी असफल होता है तो सबसे पहले वह कुंठा और अवसाद का शिकार होता है, उसे यह लगता है कि दुनिया लुट गई, इस दुनिया में आना निरर्थक हों गया. इस किंकर्तव्यविमूढ़ और कशमकश की स्थिति में वह बिना कुछ सोचे विचारे अपने-स्वजनों का ख़याल कि...