संघर्ष

 कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता....


आदरणीय गोपालदास नीरज ने जब ये पंक्तियाँ लिखी होगी तो न जाना उनके जहन में क्या रहा होगा. लेकिन आज की युवा पीढ़ी जिसके जहन में निराशा घर कर गई है, उसके लिए ये कविता आशा का नया संचार करती है और जीवन में निरंतर प्रयासरत रहने की शिक्षा देती है. वर्तमान समय में हर नोजवान का सपना रहता है कि वह कोई न कोई सरकारी नोकरी प्राप्त कर ले जिससे उसके जीवन में दाल-रोटी का जुगाड़ हों सकें.(दाल-रोटी इसलिए लिख रहा हूँ क्योंकि सरकारी नोकरी से टाटा, अम्बानी या बिडला बनने से तो रहे) इसी लक्ष्य के साथ वह संघर्ष करता है और लाखों बेरोजगारों की भीड़ में शामिल होता है. सतत एवं
निरंतर प्रयास के बलबूते वह अपने लक्ष्य को पाने में सफल होता हैं.

लेकिन जो प्रतियोगी असफल हों गये उनका क्या ?

उन्ही को जहन में रखते हुए अपने विचार साझा कर रहा हूँ. जब प्रतियोगी असफल होता है तो सबसे पहले वह कुंठा और अवसाद का शिकार होता है, उसे यह लगता है कि दुनिया लुट गई, इस दुनिया में आना निरर्थक हों गया. इस किंकर्तव्यविमूढ़ और कशमकश की स्थिति में वह बिना कुछ सोचे विचारे अपने-स्वजनों का ख़याल किये बगेर इस जीवन को समाप्त करने का निर्णय लेता है और अपने बुद्जिल होने का परिचय देता है. हाल ही में राजस्थान में हुई पात्रता परीक्षा रीट को लेकर ऐसे कई मामले सुनने में आये तो लगा कि अगर आप मौत को गले लगाते है तो कोई किला फतह नहीं कर लिया है. मरना तो एक दिन निश्चित है और यही शाश्वत सत्य है. आप मरकर कोई नई इबारत नहीं लिख देंगे. आज नही तो कल मरना ही है, जो काम कल होना निश्चित था वो आपने समय से पहले कर दिया, बस इतना ही कि आपने विधि का विधान पलट दिया. ये कोई बड़ी बात नही. बड़ी बात तो तब होती जब आप अजर-अमर होते और दुनिया को मर कर दिखाते कि ये लो अमरता के बावजूद मैंने जीवन समाप्त कर लिया, तो कहीं शायद कोई एतिहासिक कार्य होता जो स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाता.

मित्रों, संघर्ष ही जीवन है. राम ने जब अयोध्या का त्याग कर 14 वर्ष का वनवास भोगा तब जाकर वे मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्री राम कहलाये. राम का जन्म सिर्फ रावण वध के लिए नहीं हुआ था, यह कार्य तो लक्ष्मण के तरकश का एक तीर ही कर सकता था. राम का जन्म हुआ संघर्ष को परिभाषित करने को........

"धिक् जीवन को जो पाता ही आया विरोध
धिक् साधन, जिसके लिए सदा ही किया शोध
जानकी ! हाय, उद्धार प्रिया का हों न सका
वह एक और मन रहा राम का जो न थका.

कवि निराला की यह कविता राम के संघर्ष की कहानी है. जीवन में कुछ पाने के लिए बहत कुछ खोना पड़ता है. जब ईश्वर के जीवन में इतने विकट संकट आ सकते है तो मैरी और आपकी बिसात ही क्या. विश्व में ऐसे कई उदाहरन, कई कविताएँ और किस्से-कहानियां है जिनसे जीवन में संघर्ष की प्रेरणा मिलती है. इसके बावजूद जब हम ऐसे विचार मन-मष्तिष्क में लाते है तो लगता है कि कहीं न कहीं आपके अंदर ही कमी है या फिर आप उस मुकाम के काबिल नहीं है.

इस मुकाम पर आने से पहले हमने भी बहुत संघर्ष किया, गिरे और फिर उठे. इन आँखों ने कई अँधेरे देखे तब जाकर रौशनी की किरन नसीब हुई. हार मत मानिए काबिल बनिए, कामयाबी जग मारकर आपके कदम चूमेगी. एक फिम का संवाद याद आ रहा है कि अगर किसी चीज को शिद्दत से चाहो तो पूरी कायनात उसे आपसे मिलाने में जुट जाती है.

संघर्ष के दौरान जब हम असफल हुए तो मरने-मारने के स्टेट्स सोशल मिडिया पर नही लगाये. हमने ये पक्तियां लगाई......

तन जिसका हों मन और आत्मा मैरा है
चिंता नहीं बाहर उजाला या अँधेरा है
चलना मुझे है, बस अंत तक चलना
गिरना ही मुख्य नहीं, मुख्य है संभलना
गिरना क्या उसका उठा ही नहीं जो कभी
मै ही तो उठा था आप, गिरता हूँ जो अभी
फिर भी उठूँगा और बढ़कर रहूँगा मै
नर हूँ, पुरुष हूँ मै, चढ़कर रहूँगा मै. (गुप्त)

अंत में इतना कहूँगा कि लोगो का काम है कहना, कुछ तो लोग कहेंगे. लोग क्या सोचेंगे, अगर यह भी हम सोचेंगे तो फिर लोग क्या सोचंगे.

पवन सेन
(प्राध्यापक)

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