सफ़र : तब से अब तक
प्रणाम मित्रों,
ये शब्द उस बच्चे के हैं जिसकी उम्र अभी महज़ 3 वर्ष है. जो तुतलाते हुए बोलता है, इसलिए घर पर आने वाला हर व्यक्ति उससे एक ही सवाल करता है कि टारो टारो टई है और वो कहता है कि मटोड़ो. यह बात 1993 की है, जब मै 3 वर्ष का था. प्रमाण पत्रों के हिसाब से मैरा जन्म 1990 में हुआ. परिवार वाले कहते है कि बचपन में कुछ ज्यादा ही होशियार था (बाद में नहीं रहा) इसलिए विद्यालय में दाखिला जल्दी दिलवा दिया और वहाँ पर जो हेडमास्टर साहब ने जन्म दिनांक लिखी वही हमेशा के लिए रूढ़ हों गई. माँ पांचवी पास है और पिताजी उस समय शायद दसवीं पास रहे होंगे. परिवार में दादा-दादी से छह संताने है जिनमे सबसे बड़ी मेरी भुवा के बाद मैरे पिताजी का नंबर आता है. मेरे से पहले मेरी एक बहन और उसके बाद मै, इसलिए मेरा जन्म हों सकता है कि सबके लिए ख़ुशी का माहौल बन गया हों इसलिए किसी ने मेरी जन्म तिथि को याद रखना जरुरी नहीं समझा हों. इसके अलावा मैरा जन्म चित्तोडगढ जिला मुख्यालय से 45 किमी. दूर भदेसर तहसील के एक छोटे से गाँव में हुआ जहाँ उस ज़माने में पढ़े लिखें लोगों का ईतना वर्चस्व नहीं था जो यह सलाह दे पाता की जन्म दिनांक के जीवन में क्या क्या मायने है. अब आप यह सोच रहे होंगे कि एक जन्म दिनांक को लेके मै ईतना बखेड़ा क्यों कर रहा हूँ तो आज के समय में आप खुद ही समझदार है, स्वयं सोचिये की सही जन्म दिनांक की आज कितनी जरूरत होती है.
ख़ैर जाने दीजिये, तो मै कह रहा था कि लोग अक्सर मुझसे ये सवाल किया करते थे कि टारो टारो टई है. वैसे मै आपको बता दू कि मकोड़ा कहते किसे है ? चिंठी तो आपने देखी ही होगी. दिखने में चिंठी जैसा लेकिन आकार में उससे काफी बड़ा, रंग काला, वैसे तो काटता नहीं है बिना बात के लेकिन जब काटता है तो लहू की धार निकल आती है. कहने को तो हम मकोड़े को चिंठी के पिताजी के पिताजी के पिताजी के पिताजी.....कह सकते है लेकिन दोनों की प्रजातियाँ अलग हैं.
बचपन में लगभग हर बच्चा तुतलाते हुए ही बोलता है, तो मै इसका अपवाद कैसे हों सकता था. जाति से नाई (सेन) होने के कारण दादाजी जजमानी किया करते थे (अब भी करते है ) तो गाँव के और आसपास के गाँव के भी लोग घर पर ही बाल-दाढ़ी बनवाने के लिए आते थे (अभी भी आते है) तो दादाजी पोल* में बैठकर उनकी हजामत बनाते थे और दादी वही पास में बैठकर पलाश के पत्तों से पत्तल-दोने बनाती थी. उस ज़माने में पत्तल-दोनो का हमारा कोई व्यवसाय नहीं था, ये व्यवसाय तो नाई होने के नाते हमें विरासत में मिला था. जो भी गाँव जजमानी के तौर पर विरासत में मिले थे उन गाँवों में कोई भी ख़ुशी या गमी की रस्म होने पर जो दावत दी जाती थी उनमें पत्तल-दोने हमारे यही से जाते थे. उस समय गाँवों में आज जो आधुनिक कागज के पत्तल-दोने आते है उनका चलन नहीं था. लेकिन अब उत्तर आधुनिकता का दौर है और इस दौर में पेड़ के पत्तों पर खाना कौन खाए.
हाँ, तो मै कह रहा था कि दादी पत्तल-दोने बनाती थी और मैं उसके पास ही बैठा रहता था. तो आते जाते लोग अक्सर सवाल करते थे कि टारो टारो टई है मतलब कि काला काला क्या है और मै कहता कि मकोड़ा.
*पोल:- मैरे बचपन के समय मैरा पूरा घर केलूपोश था और मुख्य सड़क मैरे घर के सामने से ही होकर गुजरती है. घर का जो प्रवेश द्वार था उसे ही पोल कहते थे. पोल भी केलूपोश थी और पोल से दस कदम की दूरी तय करने के बाद सामने की तरफ दो कच्चे घर थे. पोल अब नहीं रही पर घर अभी भी है.
नोट:- सुधी पाठकों से निवेदन है कि मैरे द्वारा एक बार लिखें गये विचारों को अगर मुझे लगेगा कि बात में दम नहीं लग रहा तो में समय के साथ बदल भी सकता हूँ. जो स्मृतियाँ मै लिख रहा हूँ वो बहुत पुरानी है इसलिए समय के साथ थोड़ी धुंधली पड़ गई है.इसलिए कभी-कभी तो पोस्ट पब्लिश करने के बाद याद आता है कि यहाँ ये नहीं ये लिखा जाता तो शायद अच्छा लगता. इसलिए जब मुझे लगेगा कि संशोधन की आवश्यकता है वहाँ पर कहानी में फेरबदल होता रहेगा. निवेदन आपसे सिर्फ ईतना हैं कि आप जब भी मैरे इस ब्लॉग पर तशरीफ़ रखे तो कहानी को एक बार शुरू से सरसरी नज़र से देख ले कि कहीं कोई बदलाव तो नहीं हुआ हैं.
कहानी की भूमिका में जो कुछ लिखना था में लिख चूका हूँ. अब में चाहता हूँ कि अपने बारे में लिखू. सुधी पाठकों से एक बार फिर निवेदन है कि इसे सिर्फ एक बेतरतीब कहानी समझकर ही पढ़े. मैंने कहानी को खंडो में बाँट दिया है, ताकि पढ़ने में आसानी रहे.
टारो टारो मटोड़ो
ख़ैर जाने दीजिये, तो मै कह रहा था कि लोग अक्सर मुझसे ये सवाल किया करते थे कि टारो टारो टई है. वैसे मै आपको बता दू कि मकोड़ा कहते किसे है ? चिंठी तो आपने देखी ही होगी. दिखने में चिंठी जैसा लेकिन आकार में उससे काफी बड़ा, रंग काला, वैसे तो काटता नहीं है बिना बात के लेकिन जब काटता है तो लहू की धार निकल आती है. कहने को तो हम मकोड़े को चिंठी के पिताजी के पिताजी के पिताजी के पिताजी.....कह सकते है लेकिन दोनों की प्रजातियाँ अलग हैं.
बचपन में लगभग हर बच्चा तुतलाते हुए ही बोलता है, तो मै इसका अपवाद कैसे हों सकता था. जाति से नाई (सेन) होने के कारण दादाजी जजमानी किया करते थे (अब भी करते है ) तो गाँव के और आसपास के गाँव के भी लोग घर पर ही बाल-दाढ़ी बनवाने के लिए आते थे (अभी भी आते है) तो दादाजी पोल* में बैठकर उनकी हजामत बनाते थे और दादी वही पास में बैठकर पलाश के पत्तों से पत्तल-दोने बनाती थी. उस ज़माने में पत्तल-दोनो का हमारा कोई व्यवसाय नहीं था, ये व्यवसाय तो नाई होने के नाते हमें विरासत में मिला था. जो भी गाँव जजमानी के तौर पर विरासत में मिले थे उन गाँवों में कोई भी ख़ुशी या गमी की रस्म होने पर जो दावत दी जाती थी उनमें पत्तल-दोने हमारे यही से जाते थे. उस समय गाँवों में आज जो आधुनिक कागज के पत्तल-दोने आते है उनका चलन नहीं था. लेकिन अब उत्तर आधुनिकता का दौर है और इस दौर में पेड़ के पत्तों पर खाना कौन खाए.
हाँ, तो मै कह रहा था कि दादी पत्तल-दोने बनाती थी और मैं उसके पास ही बैठा रहता था. तो आते जाते लोग अक्सर सवाल करते थे कि टारो टारो टई है मतलब कि काला काला क्या है और मै कहता कि मकोड़ा.
*पोल:- मैरे बचपन के समय मैरा पूरा घर केलूपोश था और मुख्य सड़क मैरे घर के सामने से ही होकर गुजरती है. घर का जो प्रवेश द्वार था उसे ही पोल कहते थे. पोल भी केलूपोश थी और पोल से दस कदम की दूरी तय करने के बाद सामने की तरफ दो कच्चे घर थे. पोल अब नहीं रही पर घर अभी भी है.
नोट:- सुधी पाठकों से निवेदन है कि मैरे द्वारा एक बार लिखें गये विचारों को अगर मुझे लगेगा कि बात में दम नहीं लग रहा तो में समय के साथ बदल भी सकता हूँ. जो स्मृतियाँ मै लिख रहा हूँ वो बहुत पुरानी है इसलिए समय के साथ थोड़ी धुंधली पड़ गई है.इसलिए कभी-कभी तो पोस्ट पब्लिश करने के बाद याद आता है कि यहाँ ये नहीं ये लिखा जाता तो शायद अच्छा लगता. इसलिए जब मुझे लगेगा कि संशोधन की आवश्यकता है वहाँ पर कहानी में फेरबदल होता रहेगा. निवेदन आपसे सिर्फ ईतना हैं कि आप जब भी मैरे इस ब्लॉग पर तशरीफ़ रखे तो कहानी को एक बार शुरू से सरसरी नज़र से देख ले कि कहीं कोई बदलाव तो नहीं हुआ हैं.
मै, बचपन और दादी
मैरे बचपन का अधिकतर समय दादी के साथ ही गुजरा. कहने का मतलब जहाँ दादी वहाँ मै. जैसा कि मै पहले ही ज़िक्र कर चूका हूँ कि उस ज़माने में लडकें का जन्म होने पर एक तरह से उत्सव का माहौल हुआ करता था. (यह मानसिकता आज भी लोगों की बदली नहीं है. भारत में लगातार घटते जा रहे बाल लिंगानुपात का कारण समाज में गहराई तक व्याप्त लड़कियों के प्रति नजरिया, पितृसत्तात्मक सोच, असुरक्षा और आधुनिक तकनीक का गलत इस्तेमाल हैं.) इसलिए परिवार में नया मेहमान होने के नाते सबका चहेता बन गया था. सबसे ज्यादा चहेता उस समय मै दादी का था, माँ से सिर्फ दूध पिने तक का ही नाता था. और फिर माँ परिवार में पहली बहू थी तो घर का सारा कामकाज भी उसे ही करना पड़ता था इसलिए मैरा नाता दादी के साथ ईतना गहराई से जुड़ा की दादी के बिना मुझे चैन नहीं आता था. मुझे तो याद नहीं पर दादी कहती है कि मै उसके बिना नहीं रहता था. जजमानी प्रथा से जुड़े हुए होने के कारण दादी को कई बार आसपास के गावों में जाना पड़ता था तो वो या तो मुझे सोता हुआ छोड़ जाती या मुझे साथ ले जाती. जब तक वो अपने घुटनों पर झुला नहीं झुलाती थी मै सोता नही था. आज जब दादी कहती है कि उसके घुटनों में बहुत दर्द रहता है, तो मै अपने आप को ही दोषी ठहराता हूँ कि शायद मैरे कारण ही यह दर्द होता हों. मैरे बचपन के उस दौर में दादी के सासु माँ भी ज़िंदा थे जिन्हें हम भाभा कहते थे. वो अपनी उम्र के अंतिम पड़ाव पर थे इसलिए उनका उठना-बैठना पोल में ही होता था, जब उनके खाने का समय होता था तो परिवार वाले अक्सर मुझे ही कहा करते की जा भाभा को बुला के लेके आ खाना खायेंगे. जब उनका देहांत हुआ तो उसके बाद भी कई दिनों तक मै उन्हें बुलाने जाता रहा. उस समय ईतनी समझ नहीं थी कि मै यह जान पाता कि भाभा अब ईस दुनिया में नहीं रहे. भाभा के देहांत के बाद जब अस्तिया विसर्जन के लिए दादी को हरिद्वार जाना था तो दादी के लिए मुश्किल खड़ी हों गई. मै दादी के बिना रहता नहीं था तो दादी को मुझे भी हरिद्वार ले जाना पड़ा. उस यात्रा के बारे में ज्यादा कुछ तो याद नहीं पर ईतना याद है कि मनौतियों के दिए लिए हुए जब श्रद्धालु उन्हें गंगा की निर्मल धारा में प्रवाहित करते है तो गंगापुत्र गोताखोर दोने पकड़ के उनमे रखा चढ़ावा अपने मुँह में दबा लेते है. स्मृति के तौर पर हमने वहाँ एक फोटोग्राफ खिंचवाया था, आपके लिए उसे मै यहाँ जोड़ रहा हूँ
.आप देख सकते है कि बांये से क्रमशः मैरी भुवा, दादी, दादाजी और चाचाजी खड़े है और सबसे आगे आप जान ही गए होंगे........................क्रमशः.....
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| ये चित्र है हर की पौड़ी का.... |

Shaandaar
ReplyDeleteLajvab....
ReplyDeleteयो टारो टारो टई हैं ....माटोडो 😅
ReplyDeleteShukriya Janab.....
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